वेदों के अनुसार यज्ञ की महत्ता

वेदों के अनुसार यज्ञ की महत्ता
यज्ञ की प्रासंगिकता एवं महत्ता आज भी उतनी ही है
जितनी कि प्राचीन काल में थी| यज्ञ
की महिमा बताते हुए विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ ‘वेद’
क्या कहते हैं यह बात बहुत से लोगों में आज भी कौतुहल
का विषय है| विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ अर्थात वेद के
अनुसार-
१)यज्ञ(हवन/अग्निहोत्र) के द्वारा वायु और वर्षा-जल
की शुद्धि करनी चाहिए|
(यजुर्वेद अध्याय १, मंत्र २०)
२)यज्ञ द्वारा शुद्ध किया गया वर्षा का जल
औषधियों को पुष्ट करने वाला होता है|
(यजुर्वेद अध्याय २, मंत्र १)
३)यज्ञ के अनुष्ठान से वायु और वर्षा जल की जैसी उत्तम
शुद्धि होती है वैसी किसी भी दुसरे उपाय से
कभी नहीं हो सकती|
(यजुर्वेद अध्याय १, मंत्र १२)
४)इस संसार में मनुष्यों को वायु और जल की शुद्धि कर के
श्रेष्ठ व उत्तम सुख प्राप्त करने व कराने के लिए
सुगन्धित, पौष्टिक, औषधि तथा गौघृत आदि उत्तमोत्तम
पदार्थों के होम अर्थात आहुति करके श्रद्धा व प्रीती-
पूर्वक नित्य यज्ञ(हवन) करना चाहिए| इस प्रकार
यज्ञ के करने से संसार में सब रोग आदि नष्ट होकर उसमें
शुद्ध गुण प्रकाशित होते हैं|
(यजुर्वेद अध्याय १, मंत्र १३)
५)परमपिता परमात्मा ने मनुष्यों को आज्ञा देते हुए
निर्देशित किया है की हे मनुष्यों! जिस यज्ञ से पूर्ण
लक्ष्मी (सभी प्रकार के धन), सफल आयु (पूर्ण आयु), खाने
योग्य पौष्टिक अन्न आदि पदार्थ प्राप्त होने के साथ-
साथ रोगों का नाश हो कर सभी प्रकार के
सुखों का विस्तार होता है, उस यज्ञ
को कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए अर्थात प्रतिदिन
करते रहना चाहिए, क्योंकि बिना यज्ञ के वायु और
वर्षा-जल तथा औषधियों की शुद्धि नहीं हो सकती है
और शुद्धि के बिना कभी भी प्राणियों को भली प्रकार
सुख प्राप्त नहीं हो सकता|
(यजुर्वेद अध्याय १, मंत्र २२)
६)यज्ञ करने से वायु और वर्षा-जल
की शुद्धि द्वारा संसार को सुख प्राप्त होता है|
इसीलिए यह यज्ञ जो उत्तम वर्षा का हेतु (साधन/
कारक) है उसका अनुष्ठान करके संसार में नाना प्रकार
के सुख उत्पन्न करने चाहिए|
(यजुर्वेद अध्याय १, मंत्र १४)
७)अग्नि में जिन-जिन पदार्थों से हवन किया जाता है,
अग्नि के द्वारा परमाणु रूप हुए उन पदार्थों को सूर्य
अपनी किरणों के द्वारा खींच कर वायु के संयोग से
(वायु-मंडल में रासायनिक क्रिया करा कर) मेघ-मंडल में
स्थापित करता है और फिर वर्षा के द्वारा उन्हें
प्रथ्वी पर गिरा कर बड़े-बड़े सुख उत्पन्न करता है| इस
प्रकार यज्ञ के द्वारा वायु और जल शुद्ध होकर बहुत
सा अन्न उत्पन्न करने वाले होते हैं| इसलिए
सभी मनुष्यों को यज्ञ का अनुष्ठान अवश्य
करना चाहिए|
(यजुर्वेद अध्याय १, मंत्र ८)
इस प्रकार यज्ञ मात्र एक देव-स्तुति का माध्यम
ना होकर वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से भी बहुत
महत्त्वपूर्ण हैं| यथा-संभव हम सभी को यज्ञ के
द्वारा पर्यावरण-शुद्धि में अपना योगदान अवश्य
देना चाहिए|

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Posted in Sanatan/Hindu Life, Sanatan/Hindu Mythology

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