जैसा भोजन है वैसा ही मन है !!!

हमारे भोजन का हम पर बहुत प्रभाव पड़ता है। ये पुरानी कहावतें बिल्कुल सच है-जैसा आहार वैसा विचार और जैसा अन्न वैसा मन। भोजन तीन प्रकार के होते है- राजसिक, तामसिक और सात्विक। तीनों का अपना-अपना, अलग-अलग प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है।

प्रथम स्थान पर आता है-

राजसिक भोजन- ये हमारे मन को बहुत चंचल बनाता है तथा उसे संसार की ओर प्रवृत करता है। इसमें अण्डे, मछली, केसर, पेस्ट्री, नमक, मिर्च, मसाले आदि तथा सब उतेजक पदार्थ जैसे चाय, काफी, गरम दूध और ज्यादा मात्रा में खाया गया खाना आता है।

दूसरे स्थान पर आता है-

तामसिक भोजन- ये हमारे अंदर आलस, क्रोध,आदि उत्पन्न करता है। इसमें मांस, शराब, तम्बाकू, मादक पदार्थ, भारी और बासी खाना आते हैं। वास्तव में किसी भी भोजन की बहुत ज्यादा मात्रा तामसिक प्रभाव रखती है।

तीसरे स्थान पर आता है-

सात्विक भोजन- ये हमारे मन को शांति प्रदान करता है और पवित्र विचार उत्पन्न होते हैं। इसमें फल, सब्जियां, दूध (कम मात्रा में और ज्यादा गरम नहीं), मक्खन, पनीर, शहद, बादाम, जौ, गेंहू, दालें, चावल आदि शामिल हैं। इसमें सब सादे और हलके पदार्थ, जोकि कम मात्रा में खायें जाएं आते है।

राजसिक और तामसिक भोजन से बुरे विचार उत्पन्न होते हैं। सात्विक भोजन से शुद्ध विचार आते हैं। शुद्ध विचारों से चरित्र अच्छा बनता है और परमात्मा के प्रेम के लिए अच्छा चरित्र बहुत जरूरी है। परमात्मा के प्रेम के बिना कोई आत्मिक उन्नित नहीं हो सकती।

सदा शुद्ध सात्विक भोजन करें। सात्विक भोजन नेकी और ईमानदारी से कमाया जाना चाहिए और उस कमाई में से बुजुर्गों को और दूसरे सब लोगों को उनका उचित हिस्सा दे दिया जाना चाहिए। खाना सादा और हल्का होना चाहिए और उसे प्रसन्नचित होकर खाना और पकाना चाहिए। कम खाना चाहिए और खाने से पहले,परमात्मा का शुकर गुजार होना चाहिए।

मेहनत से कमाए हुए धन से खरीदी हुई सब्जी और अनाज आदि से सात्विक भोजन तैयार करना चाहिए। सात्विक भोजन बनाने वाला भी सात्विक स्वभाव का हो। उस सात्विक स्वभाव का असर भोजन और उसके खाने वाले पर होता है। ऐसे आहार के खाने से मन शांत होगा और चित मालिक की याद में लगेगा।

हम जैसा भी भोजन करते हैं वह अपनी प्रकृति के अनुसार हमारे तन-मन दोनों पर प्रभाव डालता है।
इसी लिए आयुर्वेद ने भोजन को तीन भागों –

सात्विक, राजसिक और तामसिक – में बांटा है। इन तीन गुणों वाले भोजन की कोई स्पष्ट विभाजक रेखा नहीं होती। ऐसे भोजन के मिश्रित मिश्रित गुण हो सकते हैं या विभिन्न अनुपातों में हो सकते हैं जो उसे तैयार करने की विधि व प्रक्रिया पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए अधिक पकाया या अधिक मसाले वाला भोजन बहुत समय बाद खाया जाए तो वह शरीर पर तामसिक प्रभाव डालेगा। इसी तरह अधिक मात्रा में लिया गया किसी का भोजन तामसिक प्रभाव डालेगा।
सात्विक भोजन: कम आंच में पका भोजन, ताजे फल, बादाम, अंकुरित अनाज और हरी व पत्तेदार सब्जियां सात्विक भोजन के तहत आते हैं। इसी तरह मसालों में हल्दी, अदरक, इलाइची, कालीमिर्च , सौंफ, जीरा व दालमिर्च सात्विक माने जाते हैं।

सात्विक भोजन हमारे शरीर को उत्तेजना और मन को चंचलता से बचाता है। इस तरह का भोजन सुपाच्य होने के कारण हमारे किडनी और लीवर पर अतिरिक्त बोझ नहीं डालता। फलतः हम अधिक ऊर्जावान महसूस करते हैं। यह भोजन हमारे शरीर के वजन को संतुलित रखता है।

राजसिक भोजन: वह सात्विक भोजन जिसमे नमक, तेल, मिर्च, मसाले आदि की अधिक मात्रा पाई जाती है और अत्यधिक तला व पका हुआ भोजन राजसिक भोजन कहलाता है। शक्कर एवं मावे की अधिकता वाला मीठा भोजन भी राजसिक भोजन होता है। बिरयानी, नूडल्स, पित्ज़ा, बर्गर, मसालेदार सब्जियां, मिठाइयां, पूरी-पराठे आदि सभी राजसिक भोजन की श्रेणी में आते हैं।

तामसिक भोजन: इस प्रकार के भोजन में मांसाहारी व बासी, सड़ा हुआ, नींद लाने वाले दुर्गन्धयुक्त भोजन आता है। प्याज, तेल, चर्बीवाले खाद्य पदार्थ, डिब्बाबंद भोजन, शराब, दवाइयां, काफी, तम्बाकू भी इसी श्रेणी में आते हैं। अत्यधिक रासायनिक खाद दाल के उपजाए अनाज और फलों और सब्जियों को भी इस श्रेणी में डाला जा सकता है।

भगवान! क्या हमें किसी अनुशासन या विनियमों का अपनी खाने की आदत में पालन करना चाहिये? क्या वह हमारे आध्यात्मिक प्रयास के लिये आवश्यक है? सम्पूर्ण विश्व के साईं भक्त आपकी शिक्षाओं के कारण शाकाहारी हो गये हैं, यह आश्चर्यजनक है। आज हमारे बीच हमारे भोजन की आदतों से सम्बन्धित विषयों को बताने वाला कोई अन्य नहीं है। कृपया हमें निर्देशित करें।

भगवान-

जैसा भोजन है वैसा ही मन है,
जैसा मन है, वैसे ही हमारे विचार है,
जैसे विचार हैं, वैसे ही कर्म हैं,
जैसे कर्म हैं वैसे ही परिणाम हैं।

इसलिये परिणाम भोजन पर निर्भर है जो तुम खाते हो। सप्रयास और बिना गलती किये तुम्हें अपने खाने की आदतों में अनुशासन का पालन करना चाहिये। भोजन, सर (Head) और ईश्वर को इस क्रम में देखना चाहिये। जैसा तुम्हारा खाना होगा वैसा ही तुम्हारा सर (Head), जैसी दशा तुम्हारे सर (Head) की होगी वैसा ही तुम में ईश्वर का प्रकटीकरण होता है।

तुम्हें बहुत अधिक नहीं खाना चाहिये। तुम्हें खाना जीने के लिये लेना चाहिये न कि जीना खाने के लिये। अत्यधिक मात्रा में भोजन लेना तामसिक गुण है। यदि तुम दिन में एक बार खाते हो, तुम योगी हो, यदि तुम दिन में दो बार खाते हो, तुम रोगी हो। यदि तुम सात्विक, मुलायम और सन्तुलित भोजन मध्यम मात्रा में लेते हो, तुम सात्विक, मन विकसित करते हो और यदि तुम राजसिक, मसालेदार, गरम भोजन लोगे तो तुम में राजसिक गुण, भावुकता, उत्तेजित मन आदि होगा और यदि तुम तामसिक भोजन, मांस शराब आदि लेते हो, तुम में तामसिक या पशुजनित गुण, आलस्य, निष्क्रिय एवं निश्चेष्ट मन होगा। अत: यह भोजन है जो मन को आकार देता है और इस पर ही तुम्हारे कर्म निर्भर है जो तुम्हें उसी प्रकार के परिणाम देते हैं।

तुम्हें “पात्र शुद्धी´´ उपयोग में आने वाले बड़े व छोटे बर्तनों की स्वच्छता, “पदार्थ शुद्धी´´ खाद्य पदार्थो की शुद्धता, “पाक शुद्धी´´ खाना पकाने का शुद्ध तरीका और “भाव शुद्धी´´ उस व्यक्ति के विचारों की शुद्धता जो भोजन बना रहा है, पर भी ध्यान देना चाहिए। तुम्हें कहीं भी दिया गया भोजन नहीं खाना चाहिये।

कुछ वर्ष पूर्व एक सन्यासी था, जिसने एक व्यापारी के निमन्त्रण पर उसके आवास पर भोजन किया। यह सन्यासी, एक ब्रह्मचारी और आध्यात्मिक जिज्ञासु पूरी रात सो नहीं सका। किसी प्रकार वह बहुत देर में सोया और स्वप्न में उसने एक सोलह साल की लड़की को रोते हुए देखा। तब यह सन्यासी अपने गुरू के पास गया और स्वप्न के बारे में उन्हें बताया। गुरू ने कुछ देर ध्यान लगाया और स्वप्न का कारण बताया कि उस दिन जब व्यापारी ने उसे भोजन के लिये बुलाया था, वह उसकी 16 वर्षीय पत्नी की मृत्यु का ग्यारहवां दिन था और वह परम्परागत विशेष अनुष्ठान कर रहा था। चूंकि सन्यासी ने उस अवसर के लिये तैयार किये भोजन को खाया, इसलिये वह लड़की जो मर चुकी थी, उसके स्वप्न में आंसू बहाते दिखाई दी। लड़की का पिता बहुत गरीब था, मुश्किल से अपना परिवार पाल रहा था। अत: लड़की की इच्छा के विपरीत उसने इस बूढ़े व्यापारी के साथ विवाह कर दिया। निराशा में उसने कुयें में कूद कर आत्महत्या कर ली। व्यापारी को परम्परागत अत्येष्टि क्रिया करना ही था, उसे ग्यारहवें दिन करते हुये उसने सन्यासी से भोजन करने हेतु घर आने का निवेदन किया था। यह सम्पूर्ण कहानी है सन्यासी के स्वप्न की। इसलिये बिना सोचे विचारे तथा बिना जाने तुम्हें किसी के भी द्वारा दिया गया भोजन नहीं खाना चाहिये।

ऐसा ही एक बार स्वामी नित्यानन्द के शिष्य के साथ घटित हुआ। एक दिन वह आश्रम के बाहर गया और बाहर खाना खाया। लौटते हुये उसने एक घर से एक चांदी का गिलास चुरा लिया और आश्रम में ले आया। लेकिन शीघ्र ही वह अपनी इस दशा पर दुखी हुआ, क्यों कि उसने चांदी के गिलास की चोरी जैसा अपराध किया था। वह रोया और पश्चाताप किया। दूसरी सुबह वह अपने गुरू के पास गया और सब कुछ स्वीकार कर लिया, क्योंकि अपनी आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा नित्यानन्द कारण जान सकते थे। उन्होंने शिष्य से कहा “खाना जो तुमने आश्रम के बाहर खाया, वह कभी रहे एक चोर द्वारा पकाया गया था, जिसके परिणाम स्वरूप तुम में चोरी की भावना उत्पन्न हुई।´´ इसलिये रसोइये के विचार भी शुद्ध होने चाहिये।

इसके अतिरिक्त, तुम्हें अपना शरीर भोजन के बाद उतना ही हल्का महसूस होना चाहिये जितना खाने के पूर्व था। आधा पेट खाली रखना सर्वोत्तम है। शेष आधा पानी तथा अन्य खाद्य पदार्थो से भरना चाहिये। तुम्हें शुद्ध दूध नहीं पीना चाहिये। तुम्हें दूध में पानी मिलाकर पीना चाहिये। तुम्हें दो भोजन के बीच कम से कम चार घन्टे का अन्तर रखना चाहिये। तुम्हें वह खाना खाना चाहिये जो तुम्हारे शरीर को आवश्यक पर्याप्त कैलोरी प्रदान करें। तुम्हें अत्यधिक तैलीय और भुनी हुई सब्जी नहीं खाना चाहिये। मध्याह्न भोजन के बाद थोड़ा सो लेना और रात्रि भोजन के बाद थोड़ा टहलना चाहिये। तुम्हे कठोर श्रम और भलीभांति भोजन करना चाहिये।

तामसिक खाना वो होता है जिसमें जिव्हा की लोलुपता को महत्व दिया जाता है और सात्विक खाना वो होता है जिसमें शरीर के पोषण का ध्यान रखा जाता है और हम लोग अक्सर तामसिक भोजन पर ज्यादा ध्यान देते है और तरह तरह बीमारियों को न्योता देते रहते है ॥ हरी ॐ ॥ श्यामगढ़ मे दो मित्र रहते थे एक बार एक मित्र ने दूसरे मित्र को खाने पर घर बुलाया मित्र को खिलाने के लिए उसने तरह तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए तय समय पर मित्र उसके घर पहुँच गया इसके बाद दोनों ने साथ मिलकर भरपेट भोजन किया जब दूसरा मित्र जाने को हुआ तो पहले मित्र ने उससे पूछा कहो भाई भोजन कैसा लगा यह सुनकर अतिथि मित्र ने जवाब दिया तुम्हारे इस सवाल का जवाब मैं आज नही बल्कि सातवें दिन दूँगा जब तुम मेरे यहाँ खाना खाने आओगे इतना कहकर उसने मेजबान मित्र को सातवें दिन अपने घर आने का और साथ भोजन करने का निमंत्रण दे दिया और रवाना हो गया सातवें दिन मित्र खाना खाने के लिए तो पहले वाले मित्र ने कहा अब तो मेरे सवाल का जवाब दो की खाना कैसा लगा था ? तो दूसरे मित्र ने कहाँ की पहले भोजन करते है फिर मे उस सवाल का जवाब दे दूँगा दोनों ने भोजन किया भोजन करने के बाद फिर पहले मित्र ने कहा अब तो भोजन भी हो गया अब तो बोलो तो दूसरा मित्र हँसते हुए बोला क्यों तुम्हें जवाब नही मिला पहला मित्र आश्चर्यचकित होते हुए बोला अगर मिल जाता तो फिर मे तुमसे वापस क्यो पूछता इस पर दूसरा मित्र बोला बेशक तुम्हारे यहाँ का भोजन बेहद स्वादिष्ट था और मेने छककर दावत उड़ाई पर जानते हो उसका नतीजा क्या हुआ पहले मित्र ने अनभिज्ञता जाहिर की इस पर दूसरा मित्र बोला यही की घर आकर मुझे पूरे एक घंटे तक सोना पड़ा आलस्य के कारण शाम तक कोई काम न कर सका पर मेरे यहाँ तुमने जो खाना खाया है उसमें तुम्हें ऐसी कोई समस्या नही होने वाली है तुम सीधे काम पर जा सकते हो पहले मित्र ने अनुभव किया की उसका कहना सच है उसने जो अपने घर पर खाना बनाया था वह तामसिक था उसमें जिव्हा की लोलुपता को महत्व दिया था और जो मित्र के यहाँ खाना खाया है वह सात्विक था उसमें शरीर के पोषण का ध्यान रखकर बनाया गया था वह समझ गया था अपना उत्तर

भोजन जीवन का आधार है। आधार हमेशा मजबूत होना चाहिए न कि मजबूरी, लापरवाही, अज्ञान अथवा अविवेक पूर्ण आचरण का भोजन कितना ही संतुलित, पौष्टिक, सुपाच्य, स्वास्थ्यवर्धक क्यों न हों, परन्तु यदि खिलानें वाले का व्यवहार अच्छा न हों, उपेक्षापूर्ण हों, वाणी में व्यंग और भाषा में अपमानजनक शब्दावली हों तो ऐसा भोजन भी अपेक्षित लाभ नहीं पहुँचा सकता। भोजन को प्रसाद की भांति खाना चाहिए। खाया हुआ भोजन तीन भागों में विभक्त हो जाता है। स्थूल भाग मल बनता है, पोष्टिक तत्त्वों से शरीर के अवयवों का निर्माण होता है। अन्न के भावांश से मन बनता है। पेट तो भोजन से भर सकता है, परन्तु मन तो भोजन बनाने और खिलाने वालों के भावों से ही भरता है। इसी कारण होटल के स्वादिष्ट खाने से पेट तो भर सकता है, परन्तु मन नहीं।

आधुनिक खान-पान की एक और विसंगति है कि जब शरीर श्रम करता है, तब उसे कम आहार दिया जाता है परन्तु जब वह विश्राम की अवस्था में होता है, तब उसे अधिक मात्रा में कैलोरीयुक्त आहार दिया जाता है। जैसे दिन का समय जो मेहनत परिश्रम का होता है तब तो हल्का भोजन, नाश्ता, चाय, काफी, ठंड़े पेय आदि कम कैलोरी वाले आहार करता है और रात्रि में जो विश्राम का समय होता है, प्रायः अधिकांश व्यक्ति गरिष्ठ भोजन करते हैं, जो स्वास्थ्य के मूल सिद्धान्तों के विपरीत होता है।

स्वाद के वशीभूत हो हम कभी-कभी अनावश्यक हानिकारक वस्तुएँ खाते हुए भी संकोच नहीं करते। भूख एवं आवश्यकता से ज्यादा भोजन कर लेते हैं। जीभ के स्वादवश अधिक आहार हो जाता है तो कभी अतिव्यस्तता के कारण भोजन ही छूट जाता है। अधिक खाना और न खाना दोनों स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। तामसिक भोजन करने वाला तामसिक वृत्तियों वाला होता है। तामसिक व्यक्ति शरीर के लिए जीता है। राजसिक भोजन से मन और बुद्धि चंचल होती है। राजसिक प्रवृत्ति वाले अत्यधिक महत्वकांक्षी होते हैं। अतः उन्हें उत्तेजना पैदा करने वाला भोजन अच्छा लगता है। सात्विक भोजन ही संतुलित होने से सर्व श्रेष्ठ होता है। भोजन के सम्बन्ध में हमारी प्राथमिकता क्या हो? जिस प्रकार बिना कपड़े पहने आभूषण पहिनने वालों पर दुनियाँ हँसती है। ठीक उसी प्रकार शरीर की पौष्टिकता के नाम पर मन, भाव और आत्मा को विकारी बनाने वाला भोजन अदूरदर्शितापूर्ण आचरण ही होता है।

अतः प्रत्येक स्वास्थ्य प्रेमी सजग व्यक्ति को भोजन कब, क्यों, कितना, कहाँ, कैसा करना चाहिए और कब, कहाँ, कैसा, कितना भोजन नहीं करना चाहिए का विवेक रखना चाहिए।

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Posted in Sanatan/Hindu Life, Sanatan/Hindu Mythology

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