संस्कृति से बांधने वाला जनेऊ

यज्ञोपवीत धारण करने के वैज्ञानिक आधार भी हैं। आयुर्वेद के अनुसार, यज्ञोपवीत धारण करने से इंसान की उम्र लंबी, बुद्धि तेज, और मन स्थिर होता है। जनेऊ धारण करने से व्यक्ति बलवान, यशस्वी, वीर और पराक्रमी होता है। आयुर्वेद में यह भी कहा गया है कि यज्ञोपवीत धारण करने से न तो हृदयरोग होता है और न ही गले और मुख का रोग सताता है…

हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक है यज्ञोपवीत। यज्ञ और उपवीत शब्दों से मिलकर बना है-यज्ञोपवीत। शास्त्रों में जहां यज् धातु को देवताओं की पूजा, दान आदि से संबंधित बताया गया है, वहीं उपवीत का अर्थ समीप या नजदीक होना होता है। इस प्रकार यज्ञोपवीत का अर्थ हुआ-यज्ञ के समीप यानी ऐसी वस्तु, जिसे धारण करने पर हम देवताओं के समीप हो जाते हैं। यज्ञोपवीत धारण करने के वैज्ञानिक आधार भी हैं। आयुर्वेद के अनुसार, यज्ञोपवीत धारण करने से इंसान की उम्र लंबी, बुद्धि तेज, और मन स्थिर होता है। जनेऊ धारण करने से व्यक्ति बलवान, यशस्वी, वीर और पराक्रमी होता है। आयुर्वेद में यह भी कहा गया है कि यज्ञोपवीत धारण करने से न तो हृदयरोग होता है और न ही गले और मुख का रोग सताता है। मान्यता है कि सन से तैयार यज्ञोपवीत पित्त रोगों से बचाव करने में सक्षम है। जो व्यक्ति स्वर्ण के तारों से तैयार यज्ञोपवीत धारण करते हैं, उन्हें आंखों की बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है। इससे बुद्धि और स्मरण शक्ति बढ़ जाती है और बुढापा भी देर से आता है। यज्ञोपवीत धारण करने से आयु वृद्धि, उत्तम विचार और धर्म मार्ग पर चलने वाली श्रेष्ठ संतान प्राप्त होती है। यही नहीं यज्ञोपवीत बल और तेज दोनों ही प्रदान करती है। इंसान का जन्म तो अपनी माता की कोख से होता है, लेकिन उसके प्राकृत जीवन को अधिक शुद्ध, संवेदनशील और विश्व कल्याण में लगाने के लिए जिस संस्कार की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह है यज्ञोपवीत। यज्ञोपवीत संस्कार को व्रतबंध, उपनयन और लोकभाषा में जनेऊ भी कहा जाता है। शास्त्रों में यज्ञोपवीत संस्कार को द्विज मात्र का पुनर्जन्म ही माना गया है, जिसके कारण वह द्विज कहलाता है।

जरूरी है यज्ञोपवीत

ब्रह्मोपनिषद् में यज्ञोपवीत को श्रेष्ठ और परमपवित्र कहा गया है। यह सृष्टि के आरंभ में भगवान प्रजापति के साथ उत्पन्न हुई थी। यज्ञोपवीत धारण करने से आयु वृद्धि, उत्तम विचार और धर्म मार्ग पर चलने वाली श्रेष्ठ संतान प्राप्त होती है। यज्ञोपवीत बल और तेज दोनों ही प्रदान करती है।

संपूर्ण फल के लिए यज्ञोपवीत

यज्ञोपवीत सारे वैदिक और पौराणिक कृत्यों में अत्यंत आवश्यक है। कई लोग कहते हैं कि उन्हें पूजा-अनुष्ठान का पूरा फल प्राप्त नहीं हो रहा है, इसका प्रमुख कारण यही है कि वे लोग बिना यज्ञोपवीत धारण किए ही सारे जप-अनुष्ठान संपन्न कर लेते हैं। सूर्योपासना और माता गायत्री की उपासना में तो यज्ञोपवीत जरूरी ही है। पितृ-तर्पण और श्राद्ध, तीर्थ पूजन आदि में यज्ञोपवीत न हो तो सारा कर्म ही निष्फल हो जाता है।

धर्म की निशानी है यज्ञोपवीत

वाल्मीकि रामायण में स्पष्ट उल्लेख है कि मर्यादा पुरूषोतम भगवान श्रीराम स्वयं धर्मके प्रतीक के रूप में यज्ञोपवीत धारण करते हैं। श्रीराम को माता-पिता और गुरु वशिष्ठ यज्ञोपवीत धारण करवाते हैं। श्रीकृष्ण का यज्ञोपवीत संस्कार महर्षि संदीपनी के आश्रम में संपन्न होता है। इसी कारण हम जब भी किसी शुभ कार्य में देवपूजन करते हैं, तो देवताओं को यज्ञोपवीत अनिवार्य रूप से चढ़ाते ही हैं। अब हम देवताओं को तो जनेऊ चढ़ाएं और स्वयं पहने ही नहीं तो भला कैसे हमें पूजन का संपूर्ण फल प्राप्त हो सकता है? लिहाजा यह जरूरी है कि जो व्यक्ति किसी भी तरह का धर्म-अनुष्ठान करना चाहता है, उसे सबसे पहले धर्म के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए यज्ञोपवीत जरूर ही धारण करनी चाहिए। विवाह से पूर्व तीन धागों की तथा विवाहोपरांत छह धागों की जनेऊ धारण की जाती है। पूर्वकाल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढ़ने का अधिकार मिलता था। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है। आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, अम्लपित्त, पेट रोग, मूत्रेंद्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोग सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत। अर्थात अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। अपनी अशुचि अवस्था को सूचित करने के लिए भी यह कृत्य उपयुक्त सिद्ध होता है।

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