प्राचीन भारत में वर्ण-मापन-विज्ञान (स्पेक्ट्रोस्कोपी)

इस सिंहावलोकनात्मक प्राक्कथन आलेख में हम प्राचीन वर्ण-क्रम-मापन विज्ञान के नीचे दिये गये बिन्दुओं पर आज के परिप्रेक्ष्य में उनकी महत्ता एवं उपादेयता का विवेचन करेंगे :
(क) उस काल में ‘वर्णक्रम मापक’ जैसे जटिल (Sophisticated) यंत्र रहे हैं।
(ख) उनका उपयोग सूर्य के प्रकाश में अवस्थित वर्णों के विक्षेपण (dispersion) मापन में तथा ‘ज्योतिष-भौतिकी’ (Astrophysics) में जिस प्रकार आज नक्षत्रों (stars) का वार्णिक वर्गीकरण (spectral classification) करते हैं, उसी रूप में करते रहे हैं।
(ग)यंत्र में प्रयुक्त होने वाले मणियों एवं गवाक्षों (lenses: prisms and windows) के निमित्त उपयुक्त लौहों (materials) को बनाने की विधियों एवं गुणों को भी जानते रहे हैं।
‘प्राच्य संस्थान, बड़ोदरा’ (Oriental Institute, Varodara), बड़ोदा के पुस्तकालय में बोधानन्द की व्याख्या से युक्त महर्षि भरद्वाज द्वारा प्रणीत ‘अंशुबोधिनी’ 1 की प्राप्त पांडुलिपि (manuscript) के ‘विषय वस्तु’ (Text) में ‘घ्वान्त-प्रमापकऱ्यंत्र के नाम से संबोधित ‘वर्णक्रम मापक’ (Spectrometer / monochromator) का वर्णन है। तदुपरांत सूर्य के प्रकाश का मणि (prism) द्वारा विक्षेपित (dispersed) विभिन्न तम-किरणों (rays of various radiation) के विभिन्न ‘सांकतों’ (symbols) के संगत प्राचीन कोण की इकाई कक्ष्य (१ कक्ष्य = १०.४ रेडियन) में अभिव्यक्त कोण परिमाणों (सांकेत संख्या) को क्रम से गिनाते हुए वर्णित किया गया है।

प्रस्तुत समस्या के समाधान हेतु संभवत: भौतिकी के सिद्धांताधीन गणना से उपर्युक्त आँकड़े पुनरुत्पादित करने में हम समर्थ रहे हैं, जिस कारण निम्नांकित निष्कर्ष प्राप्त होते हैं :
(१) वर्णक्रम मापी की विशिष्ट रूप से ऊर्ध्वाधर रचना अंतरिक्ष से आगत ध्वांत /तम (radiation) को ग्रहण कर सकने की आवश्यकता के अनुकूल है।
(२) भौतिकी सिद्धान्त की सहायता से आँकड़ों (data) के पुनरुत्पादित करने के लिये प्रस्तुत परिस्थिति में एक लिंट कांच (Flint glass) का ३०º आधार कोण वाला शंक्वाकार मणि (prism) जिसकी समतल सतह अंतरिक्ष से आपतित समानान्तर कृत (collimated) ध्वान्त किरणों के लम्बवत् हो। यह मणि संयोजन (prism setting) सभी तरंग दैर्ध्यवाली रश्मियों के लिये एक-कालिक (simultaniously) न्यूनतम विचलन (minimum deviation) किंवा सार्वत्रिक (universal) संयोजन के तुल्य है, जिसे प्रयुक्त किया है जो कि सर्वथा आधुनिकविज्ञान के लिये नये प्रकार का संयोजन विधान है।
(३) सूर्य प्रकाश के लगभग पूरे दृश्य परास (visible rang) में प्रसरित A से K तक की फ्राँउनहॉफर रेखाओं (Fraunhoffer lines) के तरंग दैर्ध्य एवं संगत ‘कक्षा’ इकाई में प्रदत्त ‘संकेत संख्या’ भली तरह से मेल खाती है।
(४) संकतों’ (symbols) की क्रमवार सूची, नक्षत्रों के आधुनिक ‘वार्णिक वर्गीकरण’ (spectroscopic classification) के समानान्तर ही परिलक्षित होती है।
इस अध्ययन क्रम से न केवल प्राचीन काल में ‘वर्णक्रम मापन विज्ञान’ (spectyroscopy) के अस्तित्व का ज्ञान होता है अपितु आधुनिक विज्ञान के ज्ञान की अभिवृद्धि में निमांकित बिन्दुओं पर योगदान प्राप्त हो सकता है।
आधुनिक भौतिकी में योगदान –
i. शंक्वाकार मणि (conical prism) से सभी तरंग दैर्ध्य की रश्मियों (rays of all wave lengths) को एक साथ न्यूनतम विचलन (minimum deviation) की स्थिति में समंजित किया जा सकता है।
ii. प्राचीन आँकड़ों के पुनरुत्पादित करने हेतु गणित के द्वारा विचलन एवं तरंग दैर्ध्य के मध्य एक सरल सूत्र प्राप्त हुवा है जिससे सीधे ही ज्ञात विचलन के आधार पर तरंग दैर्ध्य की गणना की जा सकती है।
iii. अवरक्त किरणों (Infrared rays) के लिये एक पारदर्शी विशिष्ट कांच “प्रकाश स्तंभनाभिद लौह” की खोज हुयी है जो कि पूर्णरूप से आद्रता से अप्रभावी है। आधुनिक विज्ञान में अभी तक ज्ञात नहीं है। यह कांच ईस्वी सन् १९९८ में राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला, जमशेदपुर में निर्मित की जा चुकी है।
वर्णक्र्रम मापक /’ध्वान्त प्रमापक यंत्र’ (Spectrometer) 2
प्राच्य संस्थान, बडोदरा (Oriental Institute, Vadodara) के पुस्तकालय से बोधानन्द की टीका के साथ ‘अंशुबोधिनी’ शीर्षक की महर्षि भरद्वाज रचित एक पांडुलिपि प्राप्त हुयी है। वास्तव में प्राप्त पांडुलिपि भरद्वाज के १२ अध्याय वाले ग्रंथ में से केवल पहला अध्याय है। जिसका शीर्षक “सृष्ट्याधिकार” (Evolution of Universe) है जिसमें महाविस्फोट (Big-bang) से अपने सौर मंडल के सूर्य की उत्पत्ति तक का वर्णन किया गया है, जिसमें उपर्युक्त यंत्र जो कि संभवत: उस समय प्रचलित पाँच प्रकार के वर्णक्रम मापक यंत्रों में से एक है जिसे “तम” व्यापक अर्थ में (radiation) के तीन प्रकाशकीय परास (Optical region) अर्थात् अंधतम/पराबैंगनी, गूढ़तम/दृश्य एवं तम (ultraviolet, visible and infrared regions) के मापन में प्रयुक्त होता रहा है।
चितिचैत्यस्पन्दनेन सृष्टयाद्यतेकमेवहि।
तम: प्रादुरभूद्वेगात्तम स्पृष्टवैवकेवलम्।।
तमेवमूलप्रकृतिरित्यार्हुज्ञानवित्तमा:।
तम आसीदितिप्राहतमेवहिसनातनी।।
पश्चात्तस्मिन्चितप्रकाशस्स्वभावात्प्रतिबिंबित :।
तत्सानिध्यबलातन्मूलप्रकृत्यामतिवेगत:।।
अन्धंतमोगूढंतमस्तमश्चेतियथाक्रमम्।
तमांसित्रीण्यजायन्तचित्प्रभामिश्रितानिहि।।
त्रिगुणाइतितान्येवप्रवदन्तिमनीषिण:।
सत्वंरजस्तमइतिगुणा: प्रकृतिसंभव:।।
पृष्ठ ८५, अंशुबोधिनी

अर्थात् तम/विकीरण (radiation) के लिये ध्वान्त कारण (instrumental reason) है। व्यापक अर्थ में तम आवरण (संभवत: positron) ‘कंचुक-आवरण’ (electron) की चित् (दनबसमंत बवतम) की उपस्थिति के कारण अत्यंत वेग (force) से भ्रमण करने लगती है, जिससे तीन प्रकार के ‘तम व कंचुक-आवरण के मिश्रण से त्रिगुण (तम, सत्त्व, रज) उत्त्पन्न होते हैं। जिन्हें हम क्रमश: अंधतम, गूढ़तम एवं तम (Ultraviolet, Visible, infrared) कहते हैं।

तेषुशारिकनाथोक्तध्वान्तविज्ञानभास्करे।
तमप्रमापकविधौसन्ति शास्त्राणिपंचधा।।
तदेवात्रसमासेनयथाशास्त्रंनिरूप्यते।
तमप्रमापकविधिर्यथोक्तंस्वानुभूतित:।।
ध्वान्तप्रमापकंयन्त्रंनवोत्तरशतात्मकम्।

शारिकानाथ: –
उक्तंहियन्त्रसर्वस्वेभरद्वाजेनधीमता।
द्वात्रिंशदंगसंयुक्तंतमोभेदप्रदर्शकम्।।
तस्मादत्रसमासेन तदंगंप्रविविच्यते।
तस्यत्रयोदशांगेनप्रमातुंतमसोभवेत्।।

शारिकनाथ के “ध्वान्त विज्ञान भास्कर” नामक ग्रन्थ में उल्लेख है कि भरद्वाज के ग्रंथ “यंत्र सर्वस्य” में १०९ वे यंत्र के रूप में “ध्वान्त प्रमापक यंत्र”, जो कि ३२ यंत्रांगो (ancillary components) से बना है, व्यापक रूप से ‘ध्वांत’ का विवेचन करने में समर्थ है। तथापि शारिकनाथ के अनुसार ‘तम’ (radiation) विवेचन के लिये १३ यंत्रांग ही पर्याप्त हैं, अत: हम उन्हीं पर विचार करेंगे।

ध्वान्त प्रमापक यंत्र (spectrometer) के तेरह यंत्रांगों के विवरण:
यंत्रांग १ एवं २

यंत्रस्थद्वादशांगस्यपूर्वभागेस्थितेक्रमात्।
चतुस्श्रेयथाशास्त्रंवर्तुलंभारवर्जितम्।
वितसस्तिदशकायामंसुदृढंचसुसूक्ष्मकम्।।
छायापकर्षणादर्शषडुत्तरशतात्मकम्।
शास्त्रोक्तविधिनासम्यक्स्थापयेत्सुदृढंत्तथा।।
पश्चाच्छायापकर्षणदर्पणे शास्त्र:क्रमात् –
शंकुस्थानाद्दक्षवामपार्श्वयोरुभयोरपि।
त्रिंशत्त्रिंशल्लिखेद्रेखादर्पणान्तावधिक्रमात्।।
अह:प्रमाणघटिकान्दक्षरेखास्तयो:क्रमात्।
रात्रिप्रमाणघटिकान्वामरेखस्तस्थैवहि।।
प्रदर्शयन्तिसंख्यात:तथाविघटिकान्क्रमात्।
तेषुदर्शयितुंरेखाश्चतुष्षष्ठिर्विलेखयेत्।।
सर्वत्र रेखान्त्यभागेबिन्दुनेकसमन्वितान्।
स्फुटंविलेखयेत्तद्वत्तदन्तस्सूक्ष्मतस्तथा।।

सर्वप्रथम प्रथम यंत्राग के रूप में उपयुक्त दृढता के १२० x १२० अंगुल के चतुश्रेय/वर्गाकार आधार पर अन्य बचे हुये १२ यंत्रागों में से दूसरे यंत्रांग के रूप में दर्पण योग्य (छायापकर्षणादर्श) कांचों में क्रमांक १०६ वाले पतले काँच का १२० अंगुल व्यास का चक्र दृढ़ता के साथ जमाया जाय। तदनंतर मेरुस्तंभ (शंकु) के अगल-बगल अर्थात् छायापकर्षणादर्श चक्र के क्रमश: दाँये-बाँये घटियंत्र की तरह रेखायें खींचकर दिन व रात के प्रविभागों के अंत में बिन्दु आदि से चिह्नित किया जाय।

यंत्रांग ३ (Ancillary Component ३)

चतुरंगुलमायामषड्वितस्त्युन्नतंतथा।
इतरांगैस्समाहृतविद्युत्तत्र्यादिभिर्युतम्।।
स्वमध्यादन्तपर्यन्तंवितस्तैकान्तरंयथा।
रंध्रात्रयेणसंयुक्तंशिलाकाचविनिर्मितम्।।
मेरुस्तंभाख्यशंकुंतन्मध्येसंस्थापयेद्दृढम्।

उसके पश्चात् शिला-कांच (stony glass) से निर्मित ४ अंगुल व्यास एवं ७२ अंगुल आयाम (ऊँचाई) का शंकु, जिस पर केन्द्र व केन्द्र से प्रारंभ होकर अंतिम छोर तक १२ -१२ अंगुल (वितस्ति) की दूरी पर तीन रंध्र (छिद्र) एवम् अन्य यंत्रांगों से जोड़ने वाले ‘विद्युत तंत्र’ (electrical wiring) से युक्त हो, जिसे ‘मेरुस्तम्भ’ (principal pillar) भी कहते हैं, को आधार के मध्य में सुदृढ़ता से स्थिर किया जाय।

यंत्रांग ४, ५ और ६ (Ancillary Component ४, ५ and ६)

दृढंदशांगुलायामंक्रमात्यष्ट्यंगुलोन्नतम्।
पश्चातृतीयरंध्रस्यपार्श्वयोरुभयोरपि।।
तथाद्वितीयरंध्रस्यपार्श्वयोरुभयोरपि।
शास्त्रोक्तविधिनादंडमेकंसंधारयेद्दृढम्।।
दण्डंसंधारयेतद्वत्सुदृढंकाचनिर्मितम्।
क्रमादष्टाङ्गुलायामंपंचाशदंगुलोन्नतम्।।
चत्वारिंशत्यंगुलोन्नतमायामेषडंगुलम्।
एवंप्रथमरंध्रस्यपार्श्वयोरुभयोरपि।।
दंडप्रमाणमुभयोस्समानमपिपार्श्वयो:।
दंडंसंयोजयेत्पूर्ववद्दृढंकाचनिर्मितम्।।
तथासंधारयेत्तेषुदंडानित्रीण्ययथाक्रमम्।
किंचिदूर्ध्वभवेद्दक्षेवामेथस्थात्स्थितिर्यथा। ।
दंडानांमूलदेशेसंधारयेत्पार्श्वयो: क्रमात्।
पूर्वोक्ततंत्रिभिर्युक्तचक्रकीलान्यथाविधि।।

तत्पश्चात् ‘तृतीय रंध्र’ के दोनों ओर, मेरुस्तंभ से १०-१० अंगुल की दूरी पर कांच से निर्मित ६० अंगुल लंबाई के स्तंभ, यंत्रांग-४ के रूप में तथा द्वितीय रंध्र के दोनों ओर भी मेरुस्तम्भ से ८-८ अंगुल की दूरी पर ५० अंगुल के स्तंभ यंत्रांग-५ के रूप में स्थिर किये जाँय।
यद्यपि दोनों ओर के स्तम्भऱ्युगलों की लम्बाईयाँ बराबर हैं परन्तु दाहिनी ओर के स्तम्भ की ऊँचाई उसके संगत बायीं ओर के स्तम्भ से कुछ अधिक होगी। यह स्थिति सभी स्तम्भ युगलों की होगी। मेरु स्तम्भ के अगल-बगल के दंडों पर भी विद्युत तंत्र्य (electrical wiring) तथा स्तंभ के छोर एवं आधार पर चरखी व डोरी (rope and axel) का संयोजन होगा।

यंत्रांग ७ (Ancillary cemponent-७)

पंचाशदंगुलायामंविस्तीर्णतावदेवहि।
त्रिंशद्रेखांचितंपश्चादनुलोमविलोमत:।।
स्वरूपेभानुवद्भासमानंस्वकिरणैस्स्वत:।
प्रभाकरमणिं शुद्धमष्ठाशीत्यात्मकंलघु।।
धारयन्तंमध्यभागे आतपोष्णादिभिर्युतम्।
प्रभाकरादर्शचक्रंसूर्यप्रतिनिधिंदृढ़म्।।
मेरोस्तृतीयरंध्रस्थदण्डान्त्यकेन्द्रके।
त्रिचक्रकीलकैस्सम्यक्स्थापयेद्भ्राम्यतेयथा।।

तदुपरान्त ३०-३० रेखाओं से दोनों ओर चिह्नित, ५० अंगुल व्यास के प्रभाकर/दिवाकर चक्र (circular glass plate) जिसपर मणि संख्या ८० वाला सूर्य जैसा चटक “प्रभाकर मणि” (probably a collimating lens) जड़ दिया गया हो, तृतीय रन्ध्र पर इस प्रकार स्थापित करें जिससे दाहिने स्तंभ पर लगी ३ घिर्री-डोरी के संयोजन के द्वारा घुमाया जा सके।

यंत्रांग ८ (Ancillary component ८)

पश्चाद्दिवाकरादर्शवद्रेखाबिन्दुभिर्युतम्।
सुधाद्रवशशोषादिद्रावकेश्चसुसंस्कृतम्।।
एतत्संस्कारतश्श्वेताभ्रवद्भास्वरमद्भुतम्।
आकारेणांशुभिश्चैवचन्द्रमण्डलवत्स्थितम्।।
भ्राजमानसप्तपंचाशदुत्तरशतात्मकम्।
किरणग्राहकमणिदधानमध्यकेन्द्रके।।
पंचचत्वारिंशदंगुलायामंवर्तुलंतथा।
षोडशोतरद्विशतसंख्याकसुद्ढंलघु।।
निशाकरादर्शचक्रचन्द्रपतिनिधिक्रमात्।
पूर्ववत्तृतीयरंध्रवामदण्डान्त्यकेन्द्रके।।
संधारयेत्कीलकाद्यैस्स्वतस्संचाल्यतेयथा।

पुन: दिवाकर दर्शन के समान चिह्नित एवं (भवत:) सुधाद्रव (CaOH२) तथा शशोशादि द्रावक (phosphoric acids) के द्वारा वासित शुभ्र, २०६ क्रमांक का २४ अंगुल व्यास का निशाकर दर्शचक्र, किरण-ग्राहक-मणि से युक्त मेरुस्तंभ के ऊपर तीसरे रंध्र पर इस प्रकार स्थापित करें जिससे बाँई ओर के स्तम्भ पर स्थित चरखी-डोर के संयोजन के द्वारा घुमाया जा सके।

यंत्रांग ९ (Ancillary component ९)

उष्णापकर्षकंनामलोहंस्यात्कृत्कंतत:।
तेनप्रकल्पिह्यतंभानुफलकंमधुवर्णकम्।।
निशाकरादर्शचक्रादपिन्यूनषडंगुलम्।
बिन्दुरेखांकनैर्युक्तं अवटद्वयसंयुतम्।।
प्रथमावटमध्यस्थपारदेसन्निवेशितम्।
चतुषष्ट्युत्तरशतसंख्याकंभारवर्जितम्।।
घर्मपहारकमणिंबिन्दुरेखांकनैर्युतम्।
दधानंसुदृढ़सूक्ष्ममेरोरूर्ध्वंयथाविधि।।
क्रमाद्द्वितीयरंध्रस्थदक्षदंडान्त्यकेन्द्रके।
त्रिचक्रकीलकैस्सम्यक्स्थापयेद्भ्राम्यतेयथा।।

तत्पश्चात् ‘ऊष्मापकर्षक लौह’ से बना मधुवर्ण का निशाकरदर्श चक्र से ६ अंगुल कम व्यास का, रेखाओं, बिन्दुओं व संकेतों से चिह्नित ‘भानुफलक’, जिसके मध्य व किनारे दो अवट (Cavity) हों तथा जिसमें से प्रथम पारद से पूरित अवट में १६४ क्रमांक का ‘घर्मापहारक मणि’ (infrared sensitive glass) निमज्जित हो, द्वितीय रंध्र पर स्थापित करें जिससे कि मेरुस्तंभ की दाँई ओर के स्तम्भ पर लगी चरखी-डोर के समंजन से इसे स्वतंत्रतापूर्वक घुमा सकें।

यंत्रांग १० (Ancillary component १०)

पश्चाच्चतुर्दशोत्तरद्विशतेनयथाविधि।
तमोगर्भाख्यमणिनायोजितंभारवर्जितम्।।
त्रिसप्तत्युत्तरशतात्मकंधूम्राकृतिंतत:।
छायामुखादर्शचक्रबिन्दुरेखांकनैर्युतम्।।
मेरोर्द्वितीयरंध्रस्थवामदण्डान्त्यकेन्द्रके।
निशाकरादर्शस्याधस्थात्स्थापयेदृढ़म्।।
एतत्सूर्यप्रकाशस्थतमछायाप्रकर्षणम्।
कृत्वाविनिश्चीयतेतत्प्रमाणंचांकनादिभि:।।

इसके पश्चात् बिन्दु, रेखा आदि से अंकित, १७३ क्रमांक वाले धूम के रंग के काँच का ‘छाया मुखदर्शचक्र जो कि २१४ क्रमांक वाले “तमोगर्भ मणि” (a lens suitable to ultraviolate radiation) से विधिपूर्वक सज्जित, द्वितीय रंध्र के नीचे इस प्रकार नियोजित करें जिससे मेरु स्तंभ के बाँई ओर के दण्ड पर चरखी-डोर की सहायता से घुमाया जा सके। यह सूर्य प्रकाश में स्थित तमछाया (ultraviolet radiation) को आवर्तित (अपकर्षण) कर अंकन आदि (graduations) से उनका परिमाण निर्धारित करता है।

यंत्रांग ११ (Ancillary component ११)

पश्चाद्द्विचत्वारिंशतिकप्रभामणिनायुतम्।
भागर्भादर्शवर्गस्थंषण्णवत्यात्मकंतत:।।
स्वच्छंप्रभामुखादर्शबिंदुर्रेखांकनैर्युतम्।
मेरुस्तंभप्रथमरंध्रदक्षदण्डान्त्यकेन्द्रके।।
त्रिचक्रकीलकैस्सम्यक्स्थापयेद्भ्राम्यतेयथा।
किरणोष्णप्रकाशांशंसूर्यस्येतत्स्वभावत:।।
पूर्वोक्तभानुफलकात्समाकृष्यस्वशक्तित:।
निश्चीयतेतत्प्रकाशप्रमाणस्वांकनादिभि:।।

पुन: अंशांकित ९६ क्रमांक के कांच से निर्मित “भानुगर्भदर्शचक्र” जो कि ४२ क्रमांक वाले “प्रभाकर मणि” से युक्त हो प्रथम रंध्र के ऊपर मेरुस्तंभ से दाहिनी ओर के दंड पर अवास्थित तीन चरखी-अक्ष पर ठीक से संयोजन करें, जिससे ठीक तरह से घुमाया जा सके।

यंत्रांग १२ (Ancillary component १२)

एतद्भवेत्कृतकलोह:प्रकाशस्तंभनाभिद:।
तेनप्रकल्पितंचक्रंबिन्दुरेखांकनैर्युतम्।।
नवसंख्याकमणिनावल्लभाख्येनराजितम्।
प्रकाशस्तंभनाचक्रंपंचाशीत्यात्मकंलघु।।
मेरुस्तंभप्रथमकेन्द्रवामदण्डान्त्यकेन्द्रके।
त्रिचक्रकीलकैस्सम्यक्स्थापयेत्सुदृढ़ंयथा।।
भागर्भदर्पणस्थितकिरणोष्णप्रकाशकम्।
एतत्स्वशक्त्याबध्नात्यस्पंदनंस्याद्यथाक्रमम्। ।

(पूर्व में उल्लिखित विधि से बनाये गये क्रमांक ९६ वाले) “प्रकाश स्तंभनाभिद लौह” नामक विशिष्ट काँच से निर्मित तथा बिन्दु, रेखा आदि से अंकित “प्रकाशस्तंभनचक्र”, जिसपर ९ क्रमांक वाला “वल्लभ मणि” बैठाया गया हो, प्रथम रंध्र के नीचे मेरुस्तंभ के बाँयी ओर के दण्ड पर तीन चरखी-अक्ष संयोजन को ठीक तरह से सुदृढ़ता पूर्वक स्थापित किया जाय, जिससे ‘भागर्भ दर्पण’ के गुणों के कारण प्रकाश में स्थित किरणों का मापन हो सके।

यंत्रांग १३ (Ancillary component १३)

छायाप्रभाविभाजकलौहस्यात्कृतकस्तत:।
तेनप्रकल्पितंछायाप्रभाविभाजकपट्टिकाम्।।
यावत्प्रमाणंचक्राणांषण्णामुभयपार्श्वयो:।
तावत्प्रमाणंसंक्लृप्तांपट्टिकांभारवर्जिताम्।।
मेरूस्तंभप्रथमरंध्राधोभागेयथाविधि।
पार्श्वद्वयस्थचक्राणांसंधिस्थानंन्यसेत्तत:।।

तत्पश्चात् “छाया-प्रभा विभाजक लौह” (ultraviolet-visible differentiating glass) से निर्मित “छाया-प्रभा विभाजक पट्टिका”, जो कृति में दो गोलाकार फलकों के अगल-बगल आपस में जुड़ने से प्राप्त होती है, इस प्रकार की हो ताकि मेरुस्तंभ के दोनों ओर के सभी चक्रों के क्षैतिज तल में उर्ध्वाधर प्रक्षेप को समेटने योग्य हो।

चित्र संख्या १७

महर्षि भरद्वाज का नवीनता से परिपूर्ण “ध्वान्त-प्रमापकऱ्यंत्र” (A Novel Spectrometer Monochromator) का रेखा-चित्र

“अंशुबोधिनी” के उपलब्ध पाठ में उपर्युक्त यंत्र के वर्णन को दृष्टिगत रखते हुए, इस लेख के लेखक के द्वारा संभावित रेखाचित्र अभिकल्पित किया है, जो कि अंशुबोधिनी के पाठ के अनुसार उस समय ज्ञात पाँच प्रकार के यंत्रों में से एक है, चित्र संख्या-१७ में दर्शाया गया है।

जब हम इस यंत्र के पाठ (text) का अध्ययन करते हैं तो प्रतीत होता है कि इस यंत्र में प्रकाश विकिरण के तीनों क्षेत्र अर्थात् अंधतम, गूढ़तम एवं तम (ultraviolet, visible and infrared region) के मापन के लिये आवश्यकता के अनुसार सुविधा निहित है। उदाहरणार्थ, गूढ़तम (visible radiation) के मापन हेतु प्रकाश को दिवाकर दर्श चक्र (यंत्रांग – ७) पर स्थित प्रभाकर मणि, जो कि समानान्तर कारक मणि (collimating lens) के रूप में कार्य करता है, पर आपतित करते हैं, इससे निर्गत समानान्तर किरणें निशाकर दर्श चक्र (यंत्रांग – ८) पर स्थित “किरण ग्राहक मणि” (conical prism) द्वारा आवर्त्तित होकर अंत में प्रभामुखदर्शचक्र (यंत्रांग – ११) पर स्थित प्रभामणि के द्वारा “छायापकर्षण दर्श” (यंत्रांग – २) पर वार्णिक वृत्तों (spectral remhd) के रूप में, जिनका केन्द्र अंशांकित वृत्तात्मक पैमाने के केन्द्र पर स्थित होते हुए प्रतिबिम्ब बनाता है।

तत्तद्रेखांकनैस्सम्यक्प्रमाणंतमस:क्रमात्।
निर्णेतुंशक्यतेतस्मात्तदंगोत्रप्रदर्शित:।।
प्रमाणविधिरप्यत्रसंकेतात्सोच्यतेधुना।

उपर्युक्त अंशाकित वृत्तात्मक पैमाने पर वार्णिकवृत्त (spectral ring) के छेदन बिन्दु के संगत कोण के द्वारा तम-प्रमापक-संख्या किंवा ‘सांकेत’ का मापन होता है।

वर्णक्रमीय आँकड़े (Spectral data) एवं उनकी विवेचना-
इस संदर्भ में अंशुबोधिनी में तम के वर्णक्रमीय वृत्तों के सांकेतिक नाम (सांकेत) के साथ तम-प्रमापक-संख्या कोण की “कक्ष्य” इकाई में क्रमपूर्वक दी गयी है जोकि निम्नांकित उद्धरण से प्राप्त होती है –

संकेतों की नियमावली-
तम:प्रमापकसंख्यासांकेतनिर्णय:।
अलिकंकौलिकंचैवरन्ध्रंमण्डमत:परम्।
बिंबोकंवीचकमथतामसंरौणिकंस्फुटम्।।
स्तंभं शंबरमंछूरंगुच्छकंकुडुपंतथा।
गुळिकंछेटिकंपद्मंमण्डलंकंचुकंतथा।। इत्यादि।।

तम (radiation) की तम प्रमापक संख्याओं की संगत सांकेतों की नामावली-(संस्कृत पाठ) (तम-प्रमापक-संख्या) (सांकेत)

पंचविंशच्छतकक्ष्यतमोबिन्दुरितीर्यते। १२५ तमोबिन्दु
तत्पपंचकमलीकंस्यात्त्र्यळीकंकौलिकंभवेत्।। १३० अलिक
रंध्रतत्पंचकंविन्द्यान्मण्डतस्याष्ठकंविदु:। १३३ कौलिक
तन्मण्डदशकंबिम्बोकमितिप्रोच्यतेतथा।। १३८ रंध्र
– १४६ मण्ड
– १५६ बिम्बोक
तद्विंशतिर्वीचकंस्यातामसंतद्दशस्तथा। १७६ विचक
तदष्टकंरौणिकंस्यात्कुटंतद्वादशेतिच।। १८६ तमस
– १९४ रौणिक
– २०६ कुट
ततस्तदशकंस्तंभमितिसंकीर्त्यतेक्रमात्। २१६ स्तम्भ
तत्स्तंभपंचवदशकंशंबरंस्यातथैवहि।। २३१ शम्बर
शंबरस्याष्टदशकंमंछूरमितिकीर्तितम्। २४९ मंचुर
तदष्टदशकंतद्वद्गुच्छमित्यभिधीयते।। २६७ गुच्छक
– २८७ कुडुप
कुडुपंतद्विंशतिस्स्यातदष्टाविंशतिक्रमात्। ३१५ गुलिका
प्रोच्यतेगुलिकमितितत्त्रिंशच्छेटिकंस्मृतम्।। ३४५ छोटिका
छेटिकस्यत्रयोविंशत्पद्ममित्यभिथीयते। ३६८ पद्म
तत्पद्मद्वात्रिंशतिर्मण्डळमित्युंच्यतेतथा।। ४०० मण्डल
तन्मण्डळाष्टविंशत्कंचुकमित्यभिथीयते। ४२८ कंचुक
इत्यादि।। – इत्यादि

अंशुबोधिनी के पाठ (text) में उद्धृत सूर्यप्रकाश के वर्णक्रम से संदर्भित ये आँकड़े विवेचित किये जाँच इसके पूर्व प्राचीन कोण की इकाई “कक्ष्य”, मणि संयोजन (prism setting) तथा आवश्यक सूत्र के निष्पादन हेतु वैज्ञानिक टिप्पणियों की आवश्यकता है।

प्राचीन कोण की इकाई “कक्ष्य”-
भास्कराचार्य की गणित की पुस्तक “लीलावती” के पाठ के अनुसार
व्यासेभनन्दाग्निहतेविभक्तेखबाणसूर्यैस्स: परिधिस्सूक्ष्म:।
द्वाविंशतिघ्ने हृतेथ शैले स्थूलोथवा स्याद्व्यवहारयोग्य:।।

“परिधि के सूक्ष्म परिमाण के लिए व्यास को ३९२७ से गुणा करके १२५० से भाग दें। व्यावहारिक किंवा स्थूल मान के लिए २२ से गुणा करके ७ से भाग दें।

“अत: “π” का मान २२/ ७ की अपेक्षा अधिक सही मान निमांकित व्यंजक से प्राप्त होगा।

π = ३९२७ / १२५० = ३९२७ x ८ / १२५० x ८ = ३१४१६ / १००००अर्थात् १०,०००

इकाई लम्बाई वाले वृत्त की अर्ध परिधि ३१४१६ इकाई के तुल्य होगी। अध्ययन से यह स्पष्ट है कि प्राचीन काल में इस परिधि पर की इकाई चाप (arc) के द्वारा केन्द्र पर बने कोण को १ “कक्ष्य” मानते रहे हैं।
अत: १ कक्ष्य = १०-४ रेडियन (radian) किंवा १०.००० कक्ष्य = १ रेडियन। द्रष्टव्य है कि जिस प्रकार “रेडियन” शब्द अंग्रेजी शब्द रेडियस (radius) से व्युत्पन्न होता है, उसी प्रकार “कक्ष्य” भी कक्षा (orbit) से व्युत्पन्न प्रतीत होता है।

३(ii) मणि-संयोजन (Prism Setting)-
यंत्र की विशिष्ट संरचना अंतरिक्षीय स्रोतों किंवा सौर विकिरण को सुलभता से प्राप्त करने एवं समानान्तर कारक मणि (collimating lens) की नाभि (focus) पर अवस्थित “सूचि छिद्र” (pin hole) पर आपतित होने योग्य है। प्रयुक्त मणि (prism) शंक्वाकार (conical) है जिसका समतल आपतित समानान्तर किरणों के अनुदिश एवं लम्बवत् होता है। विशिष्ट तरंग दैर्ध्य (wave length) वाला कोई वार्णिक-विकिरण-मणि (prism) एवं प्रतिबिम्ब-कारक-मणि (focussing lens) से आवर्त्तन के उपरान्त नाभितल में वार्णिक वृत्त (spectral circles) के रूप में बिम्ब बनाता है।

चित्र संख्या-१८ में किरण आरेख प्रदर्शित है। यह मणि संयोजन (prism setting) सभी तरंग दैर्ध्य वाली किरणों के लिये एक कालिक (simultancously) न्यूनतम विचलन (minimum deviation) किंवा सार्वत्रिक (universal) संयोजन के तुल्य है, जबकि त्रिकोणीय मणि (triangular prism) की अवस्था में प्रत्येक तरंग दैर्ध्य की किरणों के लिये अलग-अलग मणि-संयोजन आवश्यक होगा।

त्रिपार्श्व (Triangular prism) ABC के द्वारा किसी दी गयी तरंग दैर्ध्य की किरण के न्यूनतम विचलन के लिये प्रतिबन्ध है कि आपतित एवं निर्गत किरणें अपने संगत पार्श्व पर समान रूप से झुकी हों जैसा कि चित्रसंख्या १९ (i) में पदर्शित है। त्रिपार्श्व में किरण का मार्ग, आधार BC के समानान्तर हो जाता है। कल्पना करें कि त्रिपार्श्व के शीर्ष । से गुजरने वाला, BC रेखा पर लम्बवत् तथा ABC तल पर भी, अभिलम्बवत् है उस पर आपतित किरणें लम्बवत् होती हैं जो कि सभी तरंग दैर्ध्य की किरणों के लिये सत्य होगा तथा यह प्रतिबन्ध अनुपालित होगा। कल्पना करें काट रेखा युक्त (Shaded) अर्धभाग त्रिपार्श्व से निकाल देते हैं जैसा कि चित्र संख्या १९ (ii) में प्रदर्शित है तथा किरणें ।क् तल पर आपतित होती है, तो दाहिने भाग के द्वारा विचलन वही होगा जैसा कि पूर्व में न्यूनतम विचलन के लिये प्रतिबन्ध के समय था। चित्र संख्या १९ (iii) आवश्यक सूत्र का निगमन-
त्रिपार्श्व के द्रव्य का आवर्त्तनांक ‘µ’ का मान निम्नांकित व्यंजक से प्राप्त होगा।

µ = sin ( α+δ ) / sin α ……………………………(१)

जहाँ पर δ और α क्रमश: शंक्वाकार मणि का आधार कोण एवं आवर्त्तित किरण का विचलन है।
हम जानते हैं कि तरंग दैर्ध्य λ पर आवर्त्तनांक µ निर्भर करता है तथा λ का मान अनंत की ओर अग्रसर हो

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