ईश्वर का शुद्ध स्वरुप वेदों के अनुसार —

१. वह परमात्मा सर्वव्यापक है, शिघ्रकारी है, शरीर रहित है, नस नाडी के बंधन से रहित है | सदा पवित्र, पापों से सदा मुक्त, सर्वज्ञ, दुष्टों का तिरस्कार कर्ता और अनादी स्वरुप है | वही प्रजा के लिए सृष्टि रचना और वेद-ज्ञान प्रदान कर्ता है | –यजुर्वेद अ.४० मं ८ —

२. वह ईश्वर निष्काम,धैर्यवान, अमर, अनादी, और कही से भी न्यून नहीं है, उसको जानने वाला मृत्यु से भी नहीं डरता |–अथर्ववेद १०/८/४४ —-

३. एक देव हि सब जगत का निर्माता है, वही सब को चलाता है |उसी की संपूर्ण शक्तिया सर्वत्र एक जैसी है | वही सर्व दृष्टा और सर्वव्यापक एक प्रभु है |ऋग्वेद १०/८१/३ —-

४. उस ईश्वर के तुल्य गुण वाला कोई द्वितीय,तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ट, सप्तम, अष्टम, नवम, और दशम नहीं कहा जाता | वह एक अकेला हि है, सचमुच एक हि है |–१३/४/१६,१७,२० —

५. वही एक प्रभु, सब प्रजाओ में नमस्कार-योग्य और स्तुति योग्य है |–अथर्ववेद २/२/१

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