!!!—: महान् खगोल शास्त्री ब्रह्मगुप्त :—!!!

ब्रह्मगुप्त का जन्म 598 ई. सन् तदनुसार शक संवत् 520 (विक्रमी संवत् 541) में भिन्नमाल नामक स्थान पर हुआ था । कुछ लोगों के अनुसार यह भिन्नमाल मुल्तान (पाकिस्तान) में है। कुछ लोगों के अनुसार माउण्ट आबू, राजस्थान में है।

भास्कराचार्य ने इनको “गणकचक्रचूडामणिः” की उपाधि दी थी।

ब्रह्मगुप्त उज्जैन गुरुकुल के प्रमुख खगोल-शास्त्री थे।

उन्होंने 30 वर्ष की आयु में 628 ई. में “ब्राह्मसिद्धान्त” या “ब्रह्मस्फुट-सिद्धान्त” नामक ग्रन्थ की रचना की थी।

यह ग्रन्थ भारतीय खगोल शास्त्र का प्रामाणिक एवं मानक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में 24 अध्याय हैं। इसके अध्यायों के नाम अधिकार शब्द से युक्त है, जैसेः–मध्यमाधिकार, स्पष्टाधिकार, चन्द्रग्रहणाधिकार। या अध्याय संज्ञक है, जैसेः–गणिताध्याय, यन्त्राध्याय आदि। गोलाध्याय में भूगोल एवं खगोल सम्बन्धी गणना है। इसके 12 वें अध्याय को गणिताध्याय नाम से जाना जाता है। इसमें अंक गणित तथा छाया गणित आदि पर सामग्री दी गई है। इसके 18 वें अध्याय को “कुट्टकाध्याय” नाम दिया गया है। इसमें बीजगणित, अनिर्धार्य रैखिक एवं वर्ग समीकरणों के हल दिये गये हैं। इसके दूसरे अध्याय में त्रिकोणमिति पर विस्तार से बताया गया है।

इन्होंने 665 ई. में अपने दूसरे ग्रन्थ “खण्डखाद्यक” की रचना की थी। इस ग्रन्थ की रचना आर्यभट्ट के सिद्धान्तों के अनुसार की गई है। इसमें 10 अध्याय हैं। इसमें विशेषकर अन्तर्वेशन (Interpolation) तथा समतल त्रिकोणमिति एवं गोलीय त्रिकोणमिति दोनों में Sine (ज्या) और Cosine (कोटि ज्या) के नियम उपलब्ध हैं।

दोनों ग्रन्थ शुद्ध-सिद्धान्त ग्रन्थ हैं। ये दोनों ग्रन्थ “भण्डारकर प्राच्य विद्या संशोधन मन्दिर, पुणे महाराष्ट्र” में देखे जा सकते हैं। इन ग्रन्थों का अनुवाद अरबी और फारसी भाषाओं में हो चुका है। पश्चिम के लोगों ने इन दोनों ग्रन्थों से भरपूर लाभ उठाया है।

ब्रह्मगुप्त के प्रमुख कार्यः—-
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(1.) वर्गमूल तथा घनमूल ज्ञात करने की सरल विधियाँ दी हैं।

(2.) शून्य के गुणधर्म की व्याख्या की है।

(3.) वर्गसमीकरण के मूल को ज्ञात करने की विधि दी है।

(4.) द्विघातीय अनिर्धार्य समीकरणों को हल करने के लिए ब्रह्मगुप्त ने दो पूर्वप्रमेयों का प्रयोग किया है। इन दोनों पूर्वप्रमेयों को आज आयलर नामक पाश्चात्य गणितज्ञ (1764) ने अपने नाम पर कल लिया है। आज दुनिया में ये प्रमेय आयलर और लॉगरॉज के नाम से जाने जाते हैं, जबकि इसके निर्माता ब्रह्मगुप्त थे।

(5.) ब्रह्मगुप्त का ज्यामिति के क्षेत्र में विशेष योगदान है। इन्होंने त्रिभुज तथा चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल ज्ञात करने के सूत्र दिए हैं।

(6.) चक्रीय चतुर्भुज की भुजाएँ ज्ञात होने पर उसके कर्णों की लम्बाइयाँ ज्ञात करने के सूत्र उन्होंने दिए हैं।

(7.) ब्रह्मगुप्त का पूर्णांक चक्रीय चतुर्भुजः—ब्रह्मगुप्त ने चक्रीय चतुर्भुजों की रचना करने की विधि बतलाई, जिसमें सभी परिमाण (माप) पूर्ण संख्या है। भुजाओं की लम्बाई, कर्णों की लम्बाई, क्षेत्रफल, बहिर्वृत्त का व्यास, भुजाओं के प्रक्षेप, कर्णों के प्रतिच्छेद द्वारा निर्मित अन्तःखण्डों के माप भी पूर्ण संख्या है। बाद में पाश्चात्य गणितज्ञ आयलर (1707 से 1783) ने यह विधि अपने नाम से कर ली।

(8.) ब्रह्मगुप्त ने ज्या के मध्यवर्ती मानों को ज्ञात करने के लिए द्वितीय कोटि के अन्तर्वेशन के सूत्र दिए हैं।

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