!!!—: विश्व के महान् वैज्ञानिक :—!!! भास्कराचार्य

भास्कराचार्य का जन्म शक संवत् 1036 तदनुसार विक्रम संवत् 1171 अर्थात् 1114 ई. सन् में विज्जडवीड ग्राम में हुआ था। इस गाँव के विषय में भ्रान्तियाँ हैं। कुछ लोग इसे कर्णाटक के बीजापुर में मानते हैं तो कुछ लोग महाराष्ट्र के जलगाँव में।

इनके पिता का नाम महेश्वर था। इनके पिता ही इनके गुरु थे। भास्कराचार्य उज्जैन के गुरुकुल में खगोलशास्त्री थे। गणित और खगोलशास्त्र पर इनके तीन ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं।

सिद्धान्त शिरोमणिः—यह खगोलशास्त्र का मानक ग्रन्थ है। इसके चार भाग हैं—
(1.) लीलावती, (2.) बीजगणितम्, (3.) ग्रहगणितम्, (4.) गोलाध्याय।

ये चार अलग-अलग पुस्तक भी है। इनका अनुवाद अधिकतर भाषाओं में हो चुका है।

इनकी लोकप्रियता इस बात से प्रतिपादित है कि इन पर 4000 से अधिक टीकाएँ की जा चुकी हैं। लीलावती और बीजगणितम् को कई विश्वविद्यालों में पाठ्यक्रम के रूप में पढाया भी जाता है।

लीलावतीः—इसमें कुल नौ अध्याय हैं और 261 श्लोक हैं। इन अध्यायों के नाम हैं—(1.) दशमान स्थान संज्ञा, (2.) पूर्णांक और अपूर्णांक संख्या सम्बन्धी अष्टपरिकर्म, (3.) त्रैराशिक, (4.) पंचराशिक, सप्तराशिक इत्यादि, (5.) श्रेणी व्यवहार, (6.) क्षेत्रमान, (7.) छाया व्यवहार, (8.) अंकपाश, (9.) कुट्टक व्यवहार।

बीजगणितः—इसमें 13 अध्याय और 213 श्लोक हैं। इन अध्यायों के नाम इस प्रकार हैंः—(1.) मंगलाचरण, (2.) धन एवं ऋण संखायाओं पर बीजीय क्रियाएँ, (3.) शून्य सम्बन्धित क्रियाएँ, (4.) अनेकषड्विधि, (5.) करणी, (6.) कुट्टक, (7.) वर्गप्रकृति, (8.) चक्रवाल, (9.) एकवर्ग समीकरण, (10.) मध्यमाहरण, (11.) अनेकवर्ग समीकरण, (12.) अनेकवर्ग मध्यमाहरण, (13.) भावित।

अन्य दो ग्रन्थों में गोले तथा गोलीय त्रिकोणमिति, ग्रहणगणित, पंचांगगणित आदि विषय समाहित है।

योगदानः—
————–
(1.) दशगुणोत्तर संख्याएँः—-एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, लक्ष, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, महापद्म, शंकु, जलधि। परवर्ती गणितज्ञों ने इन नामों को यथावत् कायम रखा है।

(2.) धनात्मक संख्या को शून्य से विभाजित करने पर प्राप्त होने वाली राशि का खहर नाम दिया है। ख से शून्य का बोध होता है। अतः खहर का अर्थ हुआ जिसके हर में शून्य हो। इस प्रकार यह खहर नाम देने वाले वे प्रथम गणितज्ञ थे।

(3.) लीलावती का अंकपाश प्रकरण क्रमचय और संचय से सम्बन्धित है। इस प्रकरण का अन्तिम प्रश्न डीमाइवर (Demoivre–1730) के इसी प्रकार के प्रश्नों के समान है।

(4.) बीजगणित–गणित के कुछ समीकरणों को हल करने के लिए फर्मा ने गणितज्ञों के सामने प्रस्तुत किया था। जिसे 75 वर्षों के बाद आयलर और लॉगराज्ज ने 1732 में खोज निकाला था। भारतवर्ष में भास्कराचार्य ने इस पर फर्मा से लगभग 500 वर्ष पूर्व खोज कर ली थी।

(5.) ज्यामितः–यूक्लिज द्वारा दी गई पायथागोरस प्रमेय की उपपत्ति से भास्कराचार्य द्वारा दी गई उपपत्ति बहुत सरल है।

ध्यातव्य है कि वर्तमान में पायथागोरस के नाम से जाना जाने वाला प्रमेय वस्तुतः बौधायन का प्रमेय है, जो लगभग 500 वर्ष पूर्व का है।

इसके अतिरिक्त गणित की और भी कई खोजें भास्कराचार्य ने की है। चन्द्रमा स्वयं प्रकाशित नहीं है, अपितु वह सूर्य के प्रकाश से चमकता है। यह बात सर्वप्रथम भास्कराचार्य ने ही बतलाई थी।

सिद्धान्त शिरोमणि में यन्त्राध्याय है, जिसमें आकाश से निरीक्षण करने हेतु 9 यन्त्रों का वर्णन हैः–(1.) गोल यन्त्र, (2.) नाडी वलय (सूर्य घडी), (4.) शंकु, (5.) घटिका यन्त्र, (6.) चक्र, (7.) चाप, (8.) तूर्य, (9.) फलक यन्त्र।

गणित और खगोलशास्त्र पर इनका योगदान अतुलनीय है।

इनका देहावसान 1179 ई. में हुआ।

इनके नाम से भारत सरकार ने 7 जून 1979 को भास्कर-1, तथा 20 नवम्बर, 1981 को भास्कर-2 नाम से उपग्रह छोडे

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