ताना-रीरी का मंदिर

गाँव- वाडनगर , मेहसाना
इसी बड़गाँव में कहीं ताना-दिरे का मंदिर है | ताना और रीरी दो बहनें थीं जिन्होंने तानसेन के प्राण की रक्षा के लिए मेघ मल्हार गा कर वर्षा बरसाई थी मगर उन्हें अपनी रक्षा के लिए कुँए में कूद कर जान देनी पड़ी थी..
हुआ यह था कि अकबर के हठ पर तानसेन ने दीपक राग गया, दीपक जल उठे, लेकिन तानसेन की देह में असह्य जलन होने लगी. उस जलन का एकमात्र उपचार यही था कि राग मेघ मल्हार से होनेवाली वर्षा में नहाने को मिले.
बड़गाँव मेहसाना में एक ब्राह्मण गायक रहते थे, उन्हें मेघ मल्हार सिद्ध था. तानसेन उनके पास आए, जलन से छुटकारा पाने के लिए निवेदन करने लगे. उस गायक ने बताया , बुड़ापे के कारण वह गा नहीं सकता. तानसेन ने प्राण रक्षा की भीख माँगी.
दयावश बुढ़े गायक ने इस शपथ के साथ निवेदन स्वीकार लिया कि तानसेन किसी को नहीं बताएँगे कि किसने मल्हार गाकर वर्षा बरसाई. तानसेन ने शपथ ली. तब उसने अपनी पुत्रियों से मल्हार गवाया, वर्षा हुई, तानसेन भींगे, चंगा होकर लौट गए.
लेकिन, वे अकबर के दबाव पर शपथ बचा नहीं पाए, उन्होंने बता दिया – कैसे उनके प्राण की रक्षा हुई. अकबर ने उन लड़कियों को दरबार में गाने के लिए बुलावा भेजा, बुलावा ठुकरा दिया गया,
तब अकबर ने उन्हें पकड़ कर लाने के लिए फौज भेजी, लड़कियों ने कुँए में कूद कर जान गँवाई, अस्मत नहीं..
ताना और दिरे की याद में केवल मंदिर ही नहीं बना, तानसेन ने उन दोनों बहनों के नाम को गायन का अंग बना दिया.
आज भी ताना-रीरी …ताना-रीरी का आलाप शास्त्रीय संगीत में प्रचलित है..

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